राजस्थान में 12वीं से 14वीं विधानसभा चुनावों में जातिगत राजनीति का तुलनात्मक अध्ययन
| Vol-3 | Issue-11 | November 2018 | Published Online: 10 November 2018 PDF ( 151 KB ) | ||
| Author(s) | ||
| अशोक कुमार यादव 1 | ||
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1पीएच.डी. छात्र, राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर (राज.) |
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| Abstract | ||
राजस्थान की राजनीति में जाति, धर्म तथा भाषा तत्वों का महत्व राष्ट्रीय राजनीति की तुलना में अधिक होता है। देश की स्वतंत्रता के पष्चात् 30 मार्च 1949 को राजस्थान भारत के एक राज्य के रूप में अस्तित्व में आया था। उस समय से लेकर आज तक राजस्थान की धरती में कई उतार-चढ़ाव देखने को मिले है। राजस्थान की राजनीति में भी कई दिग्गज आए और गए लेकिन राजस्थान की जनता हर बार 5 वर्षों में सरकार से हिसाब लेना बखूबी जानती है। वहीं समय के साथ जैसे-जैसे राजस्थान की आबादी बढ़ी है, वैसे-वैसे राजस्थान में जातीय समीकरण नेताओं के फायदे और नुकसान दोनों की वजह रहा है। राजस्थान में हमेषा से ही विधानसभा चुनावों में राजपूत-जाट जातियों के द्वारा ही राज्य की दिशा तय की जाती रही है। परन्तु पिछले कुछ चुनावों से ये समीकरण बदलते जा रहे है। जहां राजपूत मतदाताओं की संख्या अधिक है वहां कोई गैर-जाति का सदस्य जीतकर विधानसभा में अपनी पहुंच बना रहा है। इससे प्रतीत होता है कि अब राज्य में जातियों के प्रभाव की अपेक्षा व्यक्ति का प्रभाव अधिक मायने रखता है। |
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| Keywords | ||
| राजस्थान, राजनीति, जाति, धर्म तथा भाषा | ||
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